Saturday, 13 November 2021

तुम्हारी यादें

 

जुदा तुम हो मुझसे ,
तुम्हारी यादें नहीं !
ऐसा कोइ भी पल नहीं ,
जिसमें तुम्हारी बातें नहीं !
वक़्त कॆ साथ यादें भी ,
पीछे छुट जाती हैं !
गया वक़्त तो आता नहीं ,
फिर यादें क्यु आ जाती हैं?
रात से सुबह, सुबह से शाम ,
फिर शाम से रात और रात से सुबह !
नाराज़ होती हूं दिल से ,
आखिरकार फिर कर लेती हूं सुलह !
चलो तुम ना सही ,
तुमहारी यादो का सहारा है !
तुम पर ना सही
तुम्हारी यादो पर हक़ हमारा है!

वक़्त

 


वक़्त ही के साथ चल रही हूं मैं तो ,
फिर क्यु रूकी रूकी सी लगती हूं !
कुछ ज्यादा सफ़र तो तय नही किया मैने ,
फिर क्यु थकी थकी सी लगती हूं !
ये कहा आ गयी हूं मैं ,
जीवन का कौन सा मोड़ है ?
वक़्त नही किसी के पास किसी के लिये भी ,
बस एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ है !
भीड़ ही भीड़ है हर ओर ,
लोगों के ही लगे मेले हैं !
जब कहना चाहो किसी को अपना ,
पता चलता है कितने सब अकेले हैं !
सबको तो पता है ,
अकेले आये और अकेले ही जाना है !
इसलिए तो गुज़ार लो साथ कुछ पल ,
क्या पता कितनी देर का साथ निभाना है !

शराफ़त

 


शराफ़त थी मेरी
जो तुझको निभाया !
ये बात भी तु
समझ ना पाया !
रुकावटॆ तो
हज़ार आइ !
हौसले भी तो
फिर मैने जुटाइ !
चाहती तो मैं भी
बहाने बनाती !
कुछ भी कह के
तुमसे पीछा छुड़ाती !
कायर तो तु भी ना था
जैसा तुने ही कहा था !
लेकिन अब तू वो ना रहा
जो कभी रहा था !
झूठे अफ़साने सुनाकर
तुने कर लिया किनारा !
बेवकूफ़ तो थी नही मैं
समझ लिया तेरा इशारा !
तुने राहे बदल ली
ढूँढ ली कोइ और मन्ज़िल !
उसकी तलाश में निकला तु
जो था शायद तेरे ही काबिल!

 


कितने दिन गुजरे ,
सुहाने सपने से मुलाक़ात नही की !
इक अरसा बीत गया ,
किसी अपने से बात नही की !
सुनती रही सबके दर्द
की कहानियों को !
मुझको मौका मिला ही नही
इसलिए किसी से साझा,अपनी जज़्बात नही की !
नफ़रत थोड़ी बहुत मुझमे भी है ,
मैने भी दुश्मनी दिखाई है किसी से !
एक बात है फिर भी अलग सी ,
किसी के साथ छुपकर मैने घात नही की !

वीरान साहिल

 

मैं तन्हाइयो की
महफ़िल हूं ,
हर किसी के
अश्को में शामिल हूं ,
वजह ना पूछॊ क्यु
मैं बस इसके ही काबिल हूं !
हसरत नही कोइ ,
कोइ उम्मीद नही ,
चाह नही कोइ ,
कोइ ज़िद नही ,
क्युन्कि मैं एक
टूटा हुआ दिल हूँ!
सुनसान हूं ,अकेला हूं ,
और नही कोइ हस्ती !
तूफ़ान लाख आये ,
जहाँ लगती नही कोइ कश्ती ,
मैं तो बस वो ही
वीरान साहिल हूं !

 

ज़िन्दगी गुज़री हमारी ,
रुठने मनाने में !
कुछ की गुज़री ,
अपनी किस्मत बनाने में !
जिनको पाना था ,
पा लिया आलिशान महल !
हम तो पड़े रहे ,
अपने टूटे से आशियाने में !
औरो के पास कमी ना रही ,
किसी बात की भी !
हम बस अफ़सोस ही
जमा करते रहे अपने खज़ाने में !
सुकुन पा लिया ,
बेफ़िक्र भी हो गये लोग !
हमने सारे पल गवाये ,
बस दूसरों को आजमाने में !

सुनो

 


सुनो,
राज़ को राज़ रहने दो ,
कल को कल और
आज को आज रहने दो !
वो घंटॊ किसी से बातें करना ,
बातें करने पर भी दिल का ना भरना ,
किसी से ना कहना ,
खामोश उसकी आवाज़ रहने दो !
सुनो,
राज़ को राज़ रहने दो ,
कल को कल और
आज को आज रहने दो !
जैसे एक भवरे की गुनगुन ,
एक प्यारी सी धुन ,
कानो में चुपके से उसकी ही
वो मीठी सी साज़ गुंजने दो !
सुनो,
राज़ को राज़ रहने दो ,
कल को कल और
आज को आज रहने दो !
चेहरॆ पर हंसी लिये ,
आंखों के वो दो जलते दिये ,
ख्यालो में बसा बस ,
उसका वही अन्दाज़ रहने दो !
सुनो,
राज़ को राज़ रहने दो ,
कल को कल और
आज को आज रहने दो !

बीती हुई बातें, बीते हुए पल वो धुन्ध्ल्ली सी यादें और बहुत से गुजरे हुए कल अक्सर याद आते हैं! खो जाना दादी की कहानियों में और खोये रहना बचप...