Saturday, 13 November 2021

शराफ़त

 


शराफ़त थी मेरी
जो तुझको निभाया !
ये बात भी तु
समझ ना पाया !
रुकावटॆ तो
हज़ार आइ !
हौसले भी तो
फिर मैने जुटाइ !
चाहती तो मैं भी
बहाने बनाती !
कुछ भी कह के
तुमसे पीछा छुड़ाती !
कायर तो तु भी ना था
जैसा तुने ही कहा था !
लेकिन अब तू वो ना रहा
जो कभी रहा था !
झूठे अफ़साने सुनाकर
तुने कर लिया किनारा !
बेवकूफ़ तो थी नही मैं
समझ लिया तेरा इशारा !
तुने राहे बदल ली
ढूँढ ली कोइ और मन्ज़िल !
उसकी तलाश में निकला तु
जो था शायद तेरे ही काबिल!

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