खोयी खोयी सी ,
रहती हूं ,
ये तो बस ,
कसूर, है तेरा !
कभी जो ढूँढू,
तुझे तो ,
क्यु लगे ,
मुझे ऐसे ,
कि तु ,दूर है खड़ा !
क्यु लगे ,
तु मुझे ,
अपना ही ,
कुछ तो ,
नाता मुझसे
ज़रूर ,है तेरा !
लोगों का क्या है ,
वो तो
कहते हैं ,
कुछ नहीं ,
बस ये ,
फ़ितूर ,है मेरा !
तेरे हाथों की ,
छुअन जब ,
मेरे कांधे पर पड़ॆ तो ,
एह्सास ये हो,
कि कुछ ,वज़ूद है मेरा !
मैं जो ख्यालो में ,
खोयी खोयी सी ,
रहती हूं ,
ये तो बस ,
कसूर ,है तेरा !
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