मुझे मुझसे बेह्तर लोग जानते हैं
ऐसा मेरा नही लोगों का कहना है !
मना नही कर सकती उनकी बातों को
क्युन्कि मुझे तो उनके साथ ही रहना है !
मैं खुद को भी नही पह्चानती अब
क्युन्कि लोग ही अब मेरी पह्चान बनाते हैं!
मैं क्या हूं ,मैं कैसी हूं
इसके किस्से लोगों को सुनाते हैं!
सुनती हूं मैं सभी की बातों को
और कोशिश करती हूं समझने की !
और ना चाहते हुए भी
कोशिश करने लगती हूं वैसा बनने की !
पह्चान तो खो ही जाती है
खुद के अस्तित्व की !
बस एक ही बात नही हटती
वो है मेरे स्त्रित्व की !
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