कुछ दिन गुजरे
मिल कर आयी हूं
अपने माता पिता से !
जाने क्यु वो चलते
फ़िरते इन्सान भी
दिखने लगे हैं एक चिता से !
"समझ नही आता
वक़्त को बलवान कहूं
या महान!
इंसान जितना सोचता है
इस जीवन को
ये है नही उतना आसान!
राहे भी मिल जाती हैं
मन्ज़िले भी मिल जाती हैं
फिर भी रह जाती है एक कमी!
हसी से भरे पल मिलते हैं
हसने के मौकॆ भी मिलते हैं
फ़िर भी आ जाती है आँखों में नमी! "
सब कुछ तो पाना ना था उनको
बस छोटे छोटे ख्वाब ही थे
जो पूरे होकर भी पूरे ना हुए!
अपनो से जुड़ कर रहने
की थी ख्वाहिश
जो जुड़ कर भी जुड़े ना रहे!
"वक़्त महान तो नही
बलवान ही होता होगा
यही समझी अब तक !
इसको सुकुन मिलता नही
अपने आगे लोगों को
झुका ना ले जब तक! "
खुद्दारी खत्म होती नही
उन पर भी वक़्त सा ही
नशा है जुनुन है!
जैसा भी पल मिले
जैसे भी लोग मिलें
उसमे ही उनको सुकुन है!
No comments:
Post a Comment