रफ़्तार ज़िन्दगी की है वही की वही
मैं भी खड़ी रही यहीं की यहीं
असमंजस में रह गयी ज़िन्दगी भर मैं तो
जो भी हुआ अब तक वो गलत कि सही...
किसी से सुना था कहीं तो पढ़ा था
कर्मो का फ़ल मिलता है ज़रूर
कहीं जाने की ज़रूरत ही क्या
सब होता है यहीं के यहीं ...
रिश्ते सभी मोह के धागे
सभी बेबस हैं इस बात के आगे
उमर गुजर जाती है इसी सोच में
नाते किसी से तोड़े कि नहीं ...
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