वक़्त चलता रहा, साँसें भी चलती रहीं
यादों के गलियारे चल कर, मैं भी तो थकती नहीं !
उम्र से लम्बी तो नही कोई दास्तां
फिर खत्म क्यु नही होता यादों का कारवां !
अजनबी लोगों को राहों में देख कर ,सोचती हूं कभी कभी
युं ही तो दिखने लगे हैं आजकल अपने सभी !
आता नही समझ- किससे दूर रहू किसे पास रखू
किनको गैरो में रखू किनको खास रखू !
रिश्तो के जाल में उलझ कर फ़सते ही जाते हैं लोग
ये प्यार, ये नफ़रत, ये सब बस लगने लगते हैं रोग !
जीवन के साथ साथ ये रोग चलते हैं
इसी रोग की वजह से हम जीवन भर जलते हैं!
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