गुनाहो की जब गिनती शुरु हुइ ,
तो मेरे गुनाह भी कुछ कम ना निकले !
मान लिया मैने भी अपनी गलतियों को ,
औरो की तरह तो हम बेशर्म ना निकले !
मिटा दी सारी गलतफ़हमियो को दिल से ,
हटा दी नफ़रत की दीवार सभी !
शुरुआत की ,ज़िन्दगी की फिर से मैने ,
जैसे जनम लिया हो अभी अभी !
हौसले तो बुलन्द थे इतने कि
आन्धी भी आये तो हम ना हिलेन्गे !
कसम भी खा ली थी ऐसी कि
खुदगर्ज़ लोगों से अब हम ना मिलेंगे !
कुछ खुद ही सोचा और कुछ सबक भी ली ,
मैने अपने गुजरे हुए हालातो से !
फिर खुद को ही तसल्ली दी ,
मैने अपने ही हाथों से !
खुद को ही खुद के साथ खड़ा रखना ,
इंसान के लिये सबसे बडी बात है !
बहुत ही हिम्मत मिलती है इससे भी ,
अगर इंसान खुद ही खुद के साथ है !
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